RE: [B-KIN] Fwd: हल्दी की उन्नत काश्त पद्धति से खेती

By   August 30, 2014

Dear Bhartendu ji,

Thanks for your consent and suggestion. I will be travelling frequently for next 10 days or so, however, we have taken your suggestion and started working on it and will share the progress with you shortly.

Thanks and Regards,

Sonal

 

From: bkin@googlegroups.com [mailto:bkin@googlegroups.com] On Behalf Of bharatendu1943 .
Sent: 25 August 2014 18:30
To: bkin@googlegroups.com
Subject: Re: [B-KIN] Fwd:
हल्दी की उन्नत काश्त पद्धति से खेती

 

I propose a small get together of organic practitioners and scientists at any time at your place. Organic cultivation does not talk. about individual elements for cultivation. Whether it is N , P or K.

On 25 Aug 2014 12:10, “Sonal Kulshreshtha” <skulsh@gmail.com> wrote:

Dear Bhartendu ji,

Thanks for your inputs and suggestions. 

I apologise that I am not agri expert and till now, most of the information we share is either contributed by our friends and partners or collected and compiled from different sources. We try our best that the information remains useful for all the practitioners. So we do not play with the information until unless we are very sure about it. 

 

Yes we promote and would love to have future where organic cultivation prevails. However, up to my understanding, in current availability of resources and context it may not always be possible for every one to avoid chemical fertilizers. One more reason, is slow re-adoption of organic cultivation methods is there is lack of (or accessibility of) scientific basis of these benefits, that create space either for doubts, misconceptions or for myths regarding organic options for agriculture( like we tried to dealt with in our last post).  

 

In this reference, I would like to have inputs and suggestions of experts like you, where we can have scientific information resource on organic cultivation and its alternatives (if required) with least risks and minimum costs especially for Farmers

 

For example, can we suggest what can be applied to fulfil the requirement of potash in organic cultivation of Haldi…, while suggesting option we need to take care about the costs and accessibility (and of course opportunity costs too)  of these options, and that other available options, and need to put all these in structured way before the stakeholders.

 

I invite all of you to enrich this resource to enhance the accessibility to maximum number of stakeholders.

 

All the information and posts we have had shared during last three- four years are available on the groups’ site, which every member can access through using their mail id. If you are not on gmailyou can search for the group name on google groups. From today onwards, all posts are also available on the following link.

 

We offer our willingness and support to all the experts to work jointly to identify the approach and way to move forward, where maximum number of partners and members can get benefited by experts and expertise on different issues including on organic cultivation.  

Bhartendu ji,

We know that you are working in the similar direction,however, there are lot more stakeholders, who need to be get benefited by your experiences, experiments and network of experts. 

 

We are also available with all our efforts and possible resources, if required and can work together to work together, if you feel it can help.

 

Thanks and Regards,

Sonal Kulshreshtha

 

 

 

2014-08-25 10:45 GMT+05:30 bharatendu1943 . <brsc2008@gmail.com>:

Dear Sonal . My advice is to avoid chemical fertilizer in haldi &other spices and medicinal crops as this reduces its effectiveness as medicine . These are in fact part of Indian food because of their medicinal  value, in curing as well prevention. Bhartendu Prakash

On 25 Aug 2014 10:29, “S Kulshreshtha” <skulshreshtha@greensync.co.in> wrote:

सभी मित्रों को नमस्कार,

 आज हम आपके साथ उन्नत तरीके से हल्दी की पैदावार की जानकारी साझा कर रहे है। जैसा की आप  जानते है की बुंदेलखंड के काफी क्षेत्र   जैसे टीकमगढ़ ,झाँसी ललितपुर आदि में हल्दी की खेती बहुतायत मात्रा   में  जाती है , यद्दपि किसान हल्दी की फसल उत्पादन  पारम्परिक तरीको से अवगत भी है परन्तु यदि हम इन तरीको में कुछ परिवर्तन करे तो हमें उत्पादन काफी  अच्छा मिल सकता है तथा  लागत भी काम आएगी। हल्दी एक महत्वपूर्ण मसाले वाली फसल है जिसका उपयोग औषधि से लेकर अनेकों कार्यो में किया जाता है। इसके गुणों का जितना भी बखान किया जाए थोड़ा ही है, क्योंकि यह फसल गुणों से परिपूर्ण है इसकी खेती आसानी से की जा सकती है तथा कम लागत तकनीक को अपनाकर इसे आमदनी का एक अच्छा साधन बनाया जा सकता है। यदि किसान भाई इसकी खेती ज्यादा मात्रा में नहीं करना चाहते तो कम से कम इतना अवश्य करें जिसका उनकी प्रति दिन की हल्दी की मांग को पूरा किया जा सकें। निम्नलिखित शास्त्र वैज्ञानिक पद्धतियों को अपना कर हल्दी की खेती सफलता पूर्वक की जा सकती है।

 

 

हल्दी की उन्नत काश्त पद्धति से खेती

भूमि का चुनाव:- 

हल्दी की खेती बलुई दोमट या मटियार दोमट मृदा में सफलतापूर्वक की जाती है। जल निकास की उचित व्यवस्था होना चाहिए। यदि जमीन थोडी अम्लीय है तो उसमें हल्दी की खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है।

भूमि की तैयारी:-

हल्दी की खेती हेतु भूमि की अच्छी तैयारी करने की आवश्यकता है क्योंकि यह जमीन के अंदर होती है जिससे जमीन को अच्छी तरह से भुरभुरी बनाया जाना आवश्यक है। मोल्ड बोल्ड प्लाऊ से कम से कम एक फीट गहरी जुताई करने के बाद दो तीन बार कल्टीवेटर चलाकर जमीन को अच्दी तरह से तैयार कर लेना चाहिए और इसमें पाटा चलाकर जमीन को समतल कर लें एवं बडे ढ़ेलो को छोटा कर लेना चाहिए।

खाद तथा उर्वरक:-

20 से 25 टन /हे. के मान से अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद का उपयोग करना चाहिए क्योंकि गोबर की खाद डालने से जमीन अच्छी तरह से भुरभुरी बन जायेगी तथा जो भी रासायनिक उर्वरक दी जायेगी उसका समुचित उपयोग हो सकेगा। इसके बाद 100-120 कि. नत्रजन 60-80 कि. स्फुर 80-100 तथा कि./हे. के मान से पोटाश का प्रयोग करना चाहिए। हल्दी की खेती हेतु पोटाश का बहुत महत्व है जो किसान इसका प्रयोग नही करते है हल्दी की गुणवत्ता तथा उपज दोनों ही प्रभावित होती है। नत्रजन की एक चैथाई मात्रा तथा स्फुर एवं पोटाश की पूरी मात्रा बोनी के समय दी जानी चाहिए एवं नत्रजन की बची मात्रा की दो भागों में बांटकर पहली मात्रा बुआई के 40 से 60 दिनों बाद तथा दूसरी मात्रा 80 से 100 दिनों बाद देना चाहिए।

फसल चक्र:-

हल्दी की सफल खेती हेतु उचित फसल चक्र का अपनाना अति आवश्यक है। इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि हल्दी की खेती लगातार उसी जमीन पर की जावें क्योंकि यह फसल जमीन से ज्यादा से ज्यादा पोषक तत्वों को खींचती है जिससे दूसरे साल उसी जमीन में इसकी खेती नहीं करें तो ज्याद अच्छा होगा। सिंचित क्षेत्रों में मक्का, आलू, मिर्च, ज्वार, धान, मूँगफल्ली आदि फसलों के साथ फसल चक्र अपनाकर हल्दी की खेती सफलतापूर्वक  की जा सकती है।

विकसित किस्में :-

मसाले वाली किस्, पूना, सोनिया, गौतम, रशिम, सुरोमा, रोमा, क्रष्णा, गुन्टूर, मेघा, हल्दा1, सुकर्ण, सुगंधन तथा सी..1 आदि प्रमुख जातियां है जिनका चुनाव किसान कर सकते है। थोडी सी मात्रा यदि एक बार मिल जाती है तो फिर अपना बीज तैयार किया जा सकता है।

बुआई:-

जिन किसान भाइयों के पास पानी की पर्याप्त सुविधा है वे अपरील के दूसरे पखवाडे़ से जुलाई के प्रथम सप्ताह तक हल्दी को लगा सकते है। लेकिन जिनके पास सिंचाई सुविधा का पर्याप्त मात्रा में अभाव है वे मानसून की बारिश शुरू होते ही हल्दी लगा सकते है किंतु खेती की तेयारी पहले से ही करके रखना चाहिए। जमीन अच्छी तरह से तैयार करने के बाद 5-7 मी., लम्बी तथा 2-3 मी. चौड़ी क्यांरिया बनाकर 30 से 45 से. मी. कतार से कातर तथा 20 – 25 से.मी. पौध से पौध की दूरी रखते हुए 4-5 से.मी. गहराइ पर गाठी कन्दो को लगाना चाहिए। इस तरह से हल्दी लगाने से 12 – 15 किवंटल हे. गाठों की जरूरत पड़ती है।

सिंचाई :-

हल्दी में ज्यादा सिंचाई की आवश्यकता नहीं है लेकिन यदि फसल गर्मी में ही बुवाई जाती है तो वर्षा प्रारंभ होने के पहले तक 4-5 सिंचाई की आवश्यकता पड़ती हैं। मानसून आने के बाद सिंचाई की जरूरत नहीं पड़ती है। किंतु यदि बीच में वर्षा नहीं होती या कि सुखा पड़ जाता है तथा अक्टूबर के बाद यदि बारिश नहीं हो पाती है तो ऐसी परिसिथति में 20-25 दिन के अंतराल पर सिंचाई करना आवश्यक हो जाता है। नवम्बर माह में पतितयों का विकास तथा धनकन्द की मोटाई बढ़ना आरंभ हो जाता है तो उस समय उपज ज्यादा प्राप्त करने हेतु मिटटी चढ़ाना आवश्यक हो जाता है जिससे कन्दो का विकास अच्छा होता है तथा उत्पादन में वृद्धि हो जाती है।

जल निकास :-

जल निकास का उचित प्रबंध करना चाहिए अन्यथा हल्दी की फसल पर विपरीत प्रभाव पड़ता है तथा पौधे एवं पत्तियां पीली पड़ने लगती है। अत: समय-समय पर वर्षा के ज्यादा पानी को खेत से बाहर निकालने की उचित व्यवस्था होनी चाहिए।

खरपतवार नियंत्रण :-

हल्दी की अच्छी फसल होने हेतु 2-3 निराइ करना आवश्यक हो जाता है। पहली निरार्इ बुआर्इ के 80-90 दिनों बाद तथा दूसरी निराइ इसके एक माह बाद करना चाहिए किन्तु यदि खरपतवार पहले ही जाते है तथा ऐसा लगता है कि फसल प्रभावित हो रही है तो इसके पहले भी एक निराइ की जा सकती है। इसके साथ ही साथ समय-समय पर गुड़ाइ भी करते रहना चाहिए जिससे वायु संचार अच्छा हो सके तथा हल्दी की फसल का पूर्ण विकास हो सके जो कि उत्पादन से सीधा संबंध रखता है।

कीट नियंत्रण :-

आम तौर पर हल्दी में कीड़ो की कोरइ ज्यादा समस्या नहीं देखी गई है कहीं- कहीं पर बेधक तथा थि्रप्स (रस चुसने वाले कीटों की) की समस्या आती है। तना बेधक हेतु फोरेट थीमेट दो में से कोई एक दवा का 10 कि. हे के हिसाब से प्रयोग किया जा सकता है।

कटाई :-

मई- जून में  बोई गई फसल फरवरी माह तक खोदने लायक हो जाती है इस समय धन कन्दो का विकास हो जाता है और पत्तियां पीली पड़कर सूखने लगती है तभी समझना चाहिए कि हल्दी पक चुकी है तथा अब इसकी कटाइ या खोदाइ की जा सकती है। पहले पौधो के दराती हसिए से काट देना चाहिए तथा बाद में हल से जुताई करके हल्दी के कन्दो को आसानी से निकाला जा सकता है जहां पर भी जरूरत समझी जाए कुदाली का भी प्रयोग किया जा सकता है। हल्दी की अगेती फसल 7-8 माह मध्यम 8-9 माह तथा देर से पकने  वाली 9-10 माह में पककर तैयार हो जाती है।

उपज :-

जहां पर उपरोक्त मात्रा में उर्वरक तथा गोबर की खाद का प्रयोग किया गया है तथा सिचिंत क्षेत्र में फसल बोई गई है तो 50-100 किवंटल प्रति हें. तथा असिचित क्षेत्रों से 50-100 किवंटल प्रति हे. कच्ची हल्दी प्राप्त की जा सकती है। यह ध्यान रहे कि कच्ची हल्दी को सूखाने के बाद 15-25 प्रतिशत ही रह जाती है।

उपचार (रचाइ) :-

हल्दी को खोदते समय पूरी तौर से सावधानी बरतनी चाहिए जिससे धन कन्दो की कम हानि हो और समूची गाठें निकाली जा सकें गाठों को पहले छोटा-छोटा कर लिया जाता है इसके बाद बड़े-बड़े कड़ाहों में डालकर इसको उबाला जाता है। उबालते समय थोड़ा गोबर या फिर हल्दी की पत्तियों को ही पानी के साथ डालकर उबाला जाता है। ऐसा करने से रंग कुछ गहरा हो जाता है तथा हल्दी की गुणवता बढ़ जाती है जिससे बाजार में भाव अच्छा मिलता है। लगभग 3-4 घंटे पकाने के बाद गाठें अंगुलियों की बीच दबाने पर आसानी से दब जाती है तो कड़ाहों से निकाल कर सूखने हेतु धूप में रखा जाता है जिससे गाठें अच्छी तरह से सूख जावें। इसके बाद किसी खुरदूरे चीज से गाठों को रगड़ कर साफ कर लिया जाता है बड़े पैमाने पर यह कार्य मशीनों पर किया जाता है और इस तरह से हल्दी की गाठें तैयार हो जाती है।

  

 


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RE: [B-KIN] Fwd: हल्दी की उन्नत काश्त पद्धति से खेती

By   August 30, 2014

Dear Bhartendu ji,

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Thanks and Regards,

Sonal

 

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Sent: 25 August 2014 18:30
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हल्दी की उन्नत काश्त पद्धति से खेती

 

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On 25 Aug 2014 12:10, “Sonal Kulshreshtha” <skulsh@gmail.com> wrote:

Dear Bhartendu ji,

Thanks for your inputs and suggestions. 

I apologise that I am not agri expert and till now, most of the information we share is either contributed by our friends and partners or collected and compiled from different sources. We try our best that the information remains useful for all the practitioners. So we do not play with the information until unless we are very sure about it. 

 

Yes we promote and would love to have future where organic cultivation prevails. However, up to my understanding, in current availability of resources and context it may not always be possible for every one to avoid chemical fertilizers. One more reason, is slow re-adoption of organic cultivation methods is there is lack of (or accessibility of) scientific basis of these benefits, that create space either for doubts, misconceptions or for myths regarding organic options for agriculture( like we tried to dealt with in our last post).  

 

In this reference, I would like to have inputs and suggestions of experts like you, where we can have scientific information resource on organic cultivation and its alternatives (if required) with least risks and minimum costs especially for Farmers

 

For example, can we suggest what can be applied to fulfil the requirement of potash in organic cultivation of Haldi…, while suggesting option we need to take care about the costs and accessibility (and of course opportunity costs too)  of these options, and that other available options, and need to put all these in structured way before the stakeholders.

 

I invite all of you to enrich this resource to enhance the accessibility to maximum number of stakeholders.

 

All the information and posts we have had shared during last three- four years are available on the groups’ site, which every member can access through using their mail id. If you are not on gmailyou can search for the group name on google groups. From today onwards, all posts are also available on the following link.

 

We offer our willingness and support to all the experts to work jointly to identify the approach and way to move forward, where maximum number of partners and members can get benefited by experts and expertise on different issues including on organic cultivation.  

Bhartendu ji,

We know that you are working in the similar direction,however, there are lot more stakeholders, who need to be get benefited by your experiences, experiments and network of experts. 

 

We are also available with all our efforts and possible resources, if required and can work together to work together, if you feel it can help.

 

Thanks and Regards,

Sonal Kulshreshtha

 

 

 

2014-08-25 10:45 GMT+05:30 bharatendu1943 . <brsc2008@gmail.com>:

Dear Sonal . My advice is to avoid chemical fertilizer in haldi &other spices and medicinal crops as this reduces its effectiveness as medicine . These are in fact part of Indian food because of their medicinal  value, in curing as well prevention. Bhartendu Prakash

On 25 Aug 2014 10:29, “S Kulshreshtha” <skulshreshtha@greensync.co.in> wrote:

सभी मित्रों को नमस्कार,

 आज हम आपके साथ उन्नत तरीके से हल्दी की पैदावार की जानकारी साझा कर रहे है। जैसा की आप  जानते है की बुंदेलखंड के काफी क्षेत्र   जैसे टीकमगढ़ ,झाँसी ललितपुर आदि में हल्दी की खेती बहुतायत मात्रा   में  जाती है , यद्दपि किसान हल्दी की फसल उत्पादन  पारम्परिक तरीको से अवगत भी है परन्तु यदि हम इन तरीको में कुछ परिवर्तन करे तो हमें उत्पादन काफी  अच्छा मिल सकता है तथा  लागत भी काम आएगी। हल्दी एक महत्वपूर्ण मसाले वाली फसल है जिसका उपयोग औषधि से लेकर अनेकों कार्यो में किया जाता है। इसके गुणों का जितना भी बखान किया जाए थोड़ा ही है, क्योंकि यह फसल गुणों से परिपूर्ण है इसकी खेती आसानी से की जा सकती है तथा कम लागत तकनीक को अपनाकर इसे आमदनी का एक अच्छा साधन बनाया जा सकता है। यदि किसान भाई इसकी खेती ज्यादा मात्रा में नहीं करना चाहते तो कम से कम इतना अवश्य करें जिसका उनकी प्रति दिन की हल्दी की मांग को पूरा किया जा सकें। निम्नलिखित शास्त्र वैज्ञानिक पद्धतियों को अपना कर हल्दी की खेती सफलता पूर्वक की जा सकती है।

 

 

हल्दी की उन्नत काश्त पद्धति से खेती

भूमि का चुनाव:- 

हल्दी की खेती बलुई दोमट या मटियार दोमट मृदा में सफलतापूर्वक की जाती है। जल निकास की उचित व्यवस्था होना चाहिए। यदि जमीन थोडी अम्लीय है तो उसमें हल्दी की खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है।

भूमि की तैयारी:-

हल्दी की खेती हेतु भूमि की अच्छी तैयारी करने की आवश्यकता है क्योंकि यह जमीन के अंदर होती है जिससे जमीन को अच्छी तरह से भुरभुरी बनाया जाना आवश्यक है। मोल्ड बोल्ड प्लाऊ से कम से कम एक फीट गहरी जुताई करने के बाद दो तीन बार कल्टीवेटर चलाकर जमीन को अच्दी तरह से तैयार कर लेना चाहिए और इसमें पाटा चलाकर जमीन को समतल कर लें एवं बडे ढ़ेलो को छोटा कर लेना चाहिए।

खाद तथा उर्वरक:-

20 से 25 टन /हे. के मान से अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद का उपयोग करना चाहिए क्योंकि गोबर की खाद डालने से जमीन अच्छी तरह से भुरभुरी बन जायेगी तथा जो भी रासायनिक उर्वरक दी जायेगी उसका समुचित उपयोग हो सकेगा। इसके बाद 100-120 कि. नत्रजन 60-80 कि. स्फुर 80-100 तथा कि./हे. के मान से पोटाश का प्रयोग करना चाहिए। हल्दी की खेती हेतु पोटाश का बहुत महत्व है जो किसान इसका प्रयोग नही करते है हल्दी की गुणवत्ता तथा उपज दोनों ही प्रभावित होती है। नत्रजन की एक चैथाई मात्रा तथा स्फुर एवं पोटाश की पूरी मात्रा बोनी के समय दी जानी चाहिए एवं नत्रजन की बची मात्रा की दो भागों में बांटकर पहली मात्रा बुआई के 40 से 60 दिनों बाद तथा दूसरी मात्रा 80 से 100 दिनों बाद देना चाहिए।

फसल चक्र:-

हल्दी की सफल खेती हेतु उचित फसल चक्र का अपनाना अति आवश्यक है। इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि हल्दी की खेती लगातार उसी जमीन पर की जावें क्योंकि यह फसल जमीन से ज्यादा से ज्यादा पोषक तत्वों को खींचती है जिससे दूसरे साल उसी जमीन में इसकी खेती नहीं करें तो ज्याद अच्छा होगा। सिंचित क्षेत्रों में मक्का, आलू, मिर्च, ज्वार, धान, मूँगफल्ली आदि फसलों के साथ फसल चक्र अपनाकर हल्दी की खेती सफलतापूर्वक  की जा सकती है।

विकसित किस्में :-

मसाले वाली किस्, पूना, सोनिया, गौतम, रशिम, सुरोमा, रोमा, क्रष्णा, गुन्टूर, मेघा, हल्दा1, सुकर्ण, सुगंधन तथा सी..1 आदि प्रमुख जातियां है जिनका चुनाव किसान कर सकते है। थोडी सी मात्रा यदि एक बार मिल जाती है तो फिर अपना बीज तैयार किया जा सकता है।

बुआई:-

जिन किसान भाइयों के पास पानी की पर्याप्त सुविधा है वे अपरील के दूसरे पखवाडे़ से जुलाई के प्रथम सप्ताह तक हल्दी को लगा सकते है। लेकिन जिनके पास सिंचाई सुविधा का पर्याप्त मात्रा में अभाव है वे मानसून की बारिश शुरू होते ही हल्दी लगा सकते है किंतु खेती की तेयारी पहले से ही करके रखना चाहिए। जमीन अच्छी तरह से तैयार करने के बाद 5-7 मी., लम्बी तथा 2-3 मी. चौड़ी क्यांरिया बनाकर 30 से 45 से. मी. कतार से कातर तथा 20 – 25 से.मी. पौध से पौध की दूरी रखते हुए 4-5 से.मी. गहराइ पर गाठी कन्दो को लगाना चाहिए। इस तरह से हल्दी लगाने से 12 – 15 किवंटल हे. गाठों की जरूरत पड़ती है।

सिंचाई :-

हल्दी में ज्यादा सिंचाई की आवश्यकता नहीं है लेकिन यदि फसल गर्मी में ही बुवाई जाती है तो वर्षा प्रारंभ होने के पहले तक 4-5 सिंचाई की आवश्यकता पड़ती हैं। मानसून आने के बाद सिंचाई की जरूरत नहीं पड़ती है। किंतु यदि बीच में वर्षा नहीं होती या कि सुखा पड़ जाता है तथा अक्टूबर के बाद यदि बारिश नहीं हो पाती है तो ऐसी परिसिथति में 20-25 दिन के अंतराल पर सिंचाई करना आवश्यक हो जाता है। नवम्बर माह में पतितयों का विकास तथा धनकन्द की मोटाई बढ़ना आरंभ हो जाता है तो उस समय उपज ज्यादा प्राप्त करने हेतु मिटटी चढ़ाना आवश्यक हो जाता है जिससे कन्दो का विकास अच्छा होता है तथा उत्पादन में वृद्धि हो जाती है।

जल निकास :-

जल निकास का उचित प्रबंध करना चाहिए अन्यथा हल्दी की फसल पर विपरीत प्रभाव पड़ता है तथा पौधे एवं पत्तियां पीली पड़ने लगती है। अत: समय-समय पर वर्षा के ज्यादा पानी को खेत से बाहर निकालने की उचित व्यवस्था होनी चाहिए।

खरपतवार नियंत्रण :-

हल्दी की अच्छी फसल होने हेतु 2-3 निराइ करना आवश्यक हो जाता है। पहली निरार्इ बुआर्इ के 80-90 दिनों बाद तथा दूसरी निराइ इसके एक माह बाद करना चाहिए किन्तु यदि खरपतवार पहले ही जाते है तथा ऐसा लगता है कि फसल प्रभावित हो रही है तो इसके पहले भी एक निराइ की जा सकती है। इसके साथ ही साथ समय-समय पर गुड़ाइ भी करते रहना चाहिए जिससे वायु संचार अच्छा हो सके तथा हल्दी की फसल का पूर्ण विकास हो सके जो कि उत्पादन से सीधा संबंध रखता है।

कीट नियंत्रण :-

आम तौर पर हल्दी में कीड़ो की कोरइ ज्यादा समस्या नहीं देखी गई है कहीं- कहीं पर बेधक तथा थि्रप्स (रस चुसने वाले कीटों की) की समस्या आती है। तना बेधक हेतु फोरेट थीमेट दो में से कोई एक दवा का 10 कि. हे के हिसाब से प्रयोग किया जा सकता है।

कटाई :-

मई- जून में  बोई गई फसल फरवरी माह तक खोदने लायक हो जाती है इस समय धन कन्दो का विकास हो जाता है और पत्तियां पीली पड़कर सूखने लगती है तभी समझना चाहिए कि हल्दी पक चुकी है तथा अब इसकी कटाइ या खोदाइ की जा सकती है। पहले पौधो के दराती हसिए से काट देना चाहिए तथा बाद में हल से जुताई करके हल्दी के कन्दो को आसानी से निकाला जा सकता है जहां पर भी जरूरत समझी जाए कुदाली का भी प्रयोग किया जा सकता है। हल्दी की अगेती फसल 7-8 माह मध्यम 8-9 माह तथा देर से पकने  वाली 9-10 माह में पककर तैयार हो जाती है।

उपज :-

जहां पर उपरोक्त मात्रा में उर्वरक तथा गोबर की खाद का प्रयोग किया गया है तथा सिचिंत क्षेत्र में फसल बोई गई है तो 50-100 किवंटल प्रति हें. तथा असिचित क्षेत्रों से 50-100 किवंटल प्रति हे. कच्ची हल्दी प्राप्त की जा सकती है। यह ध्यान रहे कि कच्ची हल्दी को सूखाने के बाद 15-25 प्रतिशत ही रह जाती है।

उपचार (रचाइ) :-

हल्दी को खोदते समय पूरी तौर से सावधानी बरतनी चाहिए जिससे धन कन्दो की कम हानि हो और समूची गाठें निकाली जा सकें गाठों को पहले छोटा-छोटा कर लिया जाता है इसके बाद बड़े-बड़े कड़ाहों में डालकर इसको उबाला जाता है। उबालते समय थोड़ा गोबर या फिर हल्दी की पत्तियों को ही पानी के साथ डालकर उबाला जाता है। ऐसा करने से रंग कुछ गहरा हो जाता है तथा हल्दी की गुणवता बढ़ जाती है जिससे बाजार में भाव अच्छा मिलता है। लगभग 3-4 घंटे पकाने के बाद गाठें अंगुलियों की बीच दबाने पर आसानी से दब जाती है तो कड़ाहों से निकाल कर सूखने हेतु धूप में रखा जाता है जिससे गाठें अच्छी तरह से सूख जावें। इसके बाद किसी खुरदूरे चीज से गाठों को रगड़ कर साफ कर लिया जाता है बड़े पैमाने पर यह कार्य मशीनों पर किया जाता है और इस तरह से हल्दी की गाठें तैयार हो जाती है।

  

 


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Re: [B-KIN] Fwd: हल्दी की उन्नत काश्त पद्धति से खेती

By   August 25, 2014
Dear Bhartendu ji,
Thanks for your inputs and suggestions. 
I apologise that I am not agri expert and till now, most of the information we share is either contributed by our friends and partners or collected and compiled from different sources. We try our best that the information remains useful for all the practitioners. So we do not play with the information until unless we are very sure about it. 
Yes we promote and would love to have future where organic cultivation prevails. However, up to my understanding, in current availability of resources and context it may not always be possible for every one to avoid chemical fertilizers. One more reason, is slow re-adoption of organic cultivation methods is there is lack of (or accessibility of) scientific basis of these benefits, that create space either for doubts, misconceptions or for myths regarding organic options for agriculture( like we tried to dealt with in our last post).  
In this reference, I would like to have inputs and suggestions of experts like you, where we can have scientific information resource on organic cultivation and its alternatives (if required) with least risks and minimum costs especially for Farmers
For example, can we suggest what can be applied to fulfil the requirement of potash in organic cultivation of Haldi…, while suggesting option we need to take care about the costs and accessibility (and of course opportunity costs too)  of these options, and that other available options, and need to put all these in structured way before the stakeholders.
I invite all of you to enrich this resource to enhance the accessibility to maximum number of stakeholders.
All the information and posts we have had shared during last three- four years are available on the groups’ site, which every member can access through using their mail id. If you are not on gmailyou can search for the group name on google groups. From today onwards, all posts are also available on the following link.
We offer our willingness and support to all the experts to work jointly to identify the approach and way to move forward, where maximum number of partners and members can get benefited by experts and expertise on different issues including on organic cultivation.  
Bhartendu ji,
We know that you are working in the similar direction,however, there are lot more stakeholders, who need to be get benefited by your experiences, experiments and network of experts. 

We are also available with all our efforts and possible resources, if required and can work together to work together, if you feel it can help.
Thanks and Regards,
Sonal Kulshreshtha
2014-08-25 10:45 GMT+05:30 bharatendu1943 . <brsc2008@gmail.com>:

Dear Sonal . My advice is to avoid chemical fertilizer in haldi &other spices and medicinal crops as this reduces its effectiveness as medicine . These are in fact part of Indian food because of their medicinal  value, in curing as well prevention. Bhartendu Prakash

On 25 Aug 2014 10:29, “S Kulshreshtha” <skulshreshtha@greensync.co.in> wrote:

सभी मित्रों को नमस्कार,

 आज हम आपके साथ उन्नत तरीके से हल्दी की पैदावार की जानकारी साझा कर रहे है। जैसा की आप  जानते है की बुंदेलखंड के काफी क्षेत्र   जैसे टीकमगढ़ ,झाँसी ललितपुर आदि में हल्दी की खेती बहुतायत मात्रा   में  जाती है , यद्दपि किसान हल्दी की फसल उत्पादन  पारम्परिक तरीको से अवगत भी है परन्तु यदि हम इन तरीको में कुछ परिवर्तन करे तो हमें उत्पादन काफी  अच्छा मिल सकता है तथा  लागत भी काम आएगी। हल्दी एक महत्वपूर्ण मसाले वाली फसल है जिसका उपयोग औषधि से लेकर अनेकों कार्यो में किया जाता है। इसके गुणों का जितना भी बखान किया जाए थोड़ा ही है, क्योंकि यह फसल गुणों से परिपूर्ण है इसकी खेती आसानी से की जा सकती है तथा कम लागत तकनीक को अपनाकर इसे आमदनी का एक अच्छा साधन बनाया जा सकता है। यदि किसान भाई इसकी खेती ज्यादा मात्रा में नहीं करना चाहते तो कम से कम इतना अवश्य करें जिसका उनकी प्रति दिन की हल्दी की मांग को पूरा किया जा सकें। निम्नलिखित शास्त्र वैज्ञानिक पद्धतियों को अपना कर हल्दी की खेती सफलता पूर्वक की जा सकती है।

 

 

हल्दी की उन्नत काश्त पद्धति से खेती

भूमि का चुनाव:- 

हल्दी की खेती बलुई दोमट या मटियार दोमट मृदा में सफलतापूर्वक की जाती है। जल निकास की उचित व्यवस्था होना चाहिए। यदि जमीन थोडी अम्लीय है तो उसमें हल्दी की खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है।

भूमि की तैयारी:-

हल्दी की खेती हेतु भूमि की अच्छी तैयारी करने की आवश्यकता है क्योंकि यह जमीन के अंदर होती है जिससे जमीन को अच्छी तरह से भुरभुरी बनाया जाना आवश्यक है। मोल्ड बोल्ड प्लाऊ से कम से कम एक फीट गहरी जुताई करने के बाद दो तीन बार कल्टीवेटर चलाकर जमीन को अच्दी तरह से तैयार कर लेना चाहिए और इसमें पाटा चलाकर जमीन को समतल कर लें एवं बडे ढ़ेलो को छोटा कर लेना चाहिए।

खाद तथा उर्वरक:-

20 से 25 टन /हे. के मान से अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद का उपयोग करना चाहिए क्योंकि गोबर की खाद डालने से जमीन अच्छी तरह से भुरभुरी बन जायेगी तथा जो भी रासायनिक उर्वरक दी जायेगी उसका समुचित उपयोग हो सकेगा। इसके बाद 100-120 कि. नत्रजन 60-80 कि. स्फुर 80-100 तथा कि./हे. के मान से पोटाश का प्रयोग करना चाहिए। हल्दी की खेती हेतु पोटाश का बहुत महत्व है जो किसान इसका प्रयोग नही करते है हल्दी की गुणवत्ता तथा उपज दोनों ही प्रभावित होती है। नत्रजन की एक चैथाई मात्रा तथा स्फुर एवं पोटाश की पूरी मात्रा बोनी के समय दी जानी चाहिए एवं नत्रजन की बची मात्रा की दो भागों में बांटकर पहली मात्रा बुआई के 40 से 60 दिनों बाद तथा दूसरी मात्रा 80 से 100 दिनों बाद देना चाहिए।

फसल चक्र:-

हल्दी की सफल खेती हेतु उचित फसल चक्र का अपनाना अति आवश्यक है। इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि हल्दी की खेती लगातार उसी जमीन पर न की जावें क्योंकि यह फसल जमीन से ज्यादा से ज्यादा पोषक तत्वों को खींचती है जिससे दूसरे साल उसी जमीन में इसकी खेती नहीं करें तो ज्याद अच्छा होगा। सिंचित क्षेत्रों में मक्का, आलू, मिर्च, ज्वार, धान, मूँगफल्ली आदि फसलों के साथ फसल चक्र अपनाकर हल्दी की खेती सफलतापूर्वक  की जा सकती है।

विकसित किस्में :-

मसाले वाली किस्‍म, पूना, सोनिया, गौतम, रशिम, सुरोमा, रोमा, क्रष्णा, गुन्टूर, मेघा, हल्दा1, सुकर्ण, सुगंधन तथा सी.ओ.1 आदि प्रमुख जातियां है जिनका चुनाव किसान कर सकते है। थोडी सी मात्रा यदि एक बार मिल जाती है तो फिर अपना बीज तैयार किया जा सकता है।

बुआई:-

जिन किसान भाइयों के पास पानी की पर्याप्त सुविधा है वे अपरील के दूसरे पखवाडे़ से जुलाई के प्रथम सप्ताह तक हल्दी को लगा सकते है। लेकिन जिनके पास सिंचाई सुविधा का पर्याप्त मात्रा में अभाव है वे मानसून की बारिश शुरू होते ही हल्दी लगा सकते है किंतु खेती की तेयारी पहले से ही करके रखना चाहिए। जमीन अच्छी तरह से तैयार करने के बाद 5-7 मी., लम्बी तथा 2-3 मी. चौड़ी क्यांरिया बनाकर 30 से 45 से. मी. कतार से कातर तथा 20 – 25 से.मी. पौध से पौध की दूरी रखते हुए 4-5 से.मी. गहराइ पर गाठी कन्दो को लगाना चाहिए। इस तरह से हल्दी लगाने से 12 – 15 किवंटल हे. गाठों की जरूरत पड़ती है।

सिंचाई :-

हल्दी में ज्यादा सिंचाई की आवश्यकता नहीं है लेकिन यदि फसल गर्मी में ही बुवाई जाती है तो वर्षा प्रारंभ होने के पहले तक 4-5 सिंचाई की आवश्यकता पड़ती हैं। मानसून आने के बाद सिंचाई की जरूरत नहीं पड़ती है। किंतु यदि बीच में वर्षा नहीं होती या कि सुखा पड़ जाता है तथा अक्टूबर के बाद यदि बारिश नहीं हो पाती है तो ऐसी परिसिथति में 20-25 दिन के अंतराल पर सिंचाई करना आवश्यक हो जाता है। नवम्बर माह में पतितयों का विकास तथा धनकन्द की मोटाई बढ़ना आरंभ हो जाता है तो उस समय उपज ज्यादा प्राप्त करने हेतु मिटटी चढ़ाना आवश्यक हो जाता है जिससे कन्दो का विकास अच्छा होता है तथा उत्पादन में वृद्धि हो जाती है।

जल निकास :-

जल निकास का उचित प्रबंध करना चाहिए अन्यथा हल्दी की फसल पर विपरीत प्रभाव पड़ता है तथा पौधे एवं पत्तियां पीली पड़ने लगती है। अत: समय-समय पर वर्षा के ज्यादा पानी को खेत से बाहर निकालने की उचित व्यवस्था होनी चाहिए।

खरपतवार नियंत्रण :-

हल्दी की अच्छी फसल होने हेतु 2-3 निराइ करना आवश्यक हो जाता है। पहली निरार्इ बुआर्इ के 80-90 दिनों बाद तथा दूसरी निराइ इसके एक माह बाद करना चाहिए किन्तु यदि खरपतवार पहले ही आ जाते है तथा ऐसा लगता है कि फसल प्रभावित हो रही है तो इसके पहले भी एक निराइ की जा सकती है। इसके साथ ही साथ समय-समय पर गुड़ाइ भी करते रहना चाहिए जिससे वायु संचार अच्छा हो सके तथा हल्दी की फसल का पूर्ण विकास हो सके जो कि उत्पादन से सीधा संबंध रखता है।

कीट नियंत्रण :-

आम तौर पर हल्दी में कीड़ो की कोरइ ज्यादा समस्या नहीं देखी गई है कहीं- कहीं पर बेधक तथा थि्रप्स (रस चुसने वाले कीटों की) की समस्या आती है। तना बेधक हेतु फोरेट थीमेट दो में से कोई एक दवा का 10 कि. हे के हिसाब से प्रयोग किया जा सकता है।

कटाई :-

मई- जून में  बोई गई फसल फरवरी माह तक खोदने लायक हो जाती है इस समय धन कन्दो का विकास हो जाता है और पत्तियां पीली पड़कर सूखने लगती है तभी समझना चाहिए कि हल्दी पक चुकी है तथा अब इसकी कटाइ या खोदाइ की जा सकती है। पहले पौधो के दराती हसिए से काट देना चाहिए तथा बाद में हल से जुताई करके हल्दी के कन्दो को आसानी से निकाला जा सकता है जहां पर भी जरूरत समझी जाए कुदाली का भी प्रयोग किया जा सकता है। हल्दी की अगेती फसल 7-8 माह मध्यम 8-9 माह तथा देर से पकने  वाली 9-10 माह में पककर तैयार हो जाती है।

उपज :-

जहां पर उपरोक्त मात्रा में उर्वरक तथा गोबर की खाद का प्रयोग किया गया है तथा सिचिंत क्षेत्र में फसल बोई गई है तो 50-100 किवंटल प्रति हें. तथा असिचित क्षेत्रों से 50-100 किवंटल प्रति हे. कच्ची हल्दी प्राप्त की जा सकती है। यह ध्यान रहे कि कच्ची हल्दी को सूखाने के बाद 15-25 प्रतिशत ही रह जाती है।

उपचार (रचाइ) :-

हल्दी को खोदते समय पूरी तौर से सावधानी बरतनी चाहिए जिससे धन कन्दो की कम हानि हो और समूची गाठें निकाली जा सकें गाठों को पहले छोटा-छोटा कर लिया जाता है इसके बाद बड़े-बड़े कड़ाहों में डालकर इसको उबाला जाता है। उबालते समय थोड़ा गोबर या फिर हल्दी की पत्तियों को ही पानी के साथ डालकर उबाला जाता है। ऐसा करने से रंग कुछ गहरा हो जाता है तथा हल्दी की गुणवता बढ़ जाती है जिससे बाजार में भाव अच्छा मिलता है। लगभग 3-4 घंटे पकाने के बाद गाठें अंगुलियों की बीच दबाने पर आसानी से दब जाती है तो कड़ाहों से निकाल कर सूखने हेतु धूप में रखा जाता है जिससे गाठें अच्छी तरह से सूख जावें। इसके बाद किसी खुरदूरे चीज से गाठों को रगड़ कर साफ कर लिया जाता है बड़े पैमाने पर यह कार्य मशीनों पर किया जाता है और इस तरह से हल्दी की गाठें तैयार हो जाती है।

  


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Re: [B-KIN] Fwd: हल्दी की उन्नत काश्त पद्धति से खेती

By   August 25, 2014

Dear Sonal .
My advice is to avoid chemical fertilizer in haldi &other spices and medicinal crops as this reduces its effectiveness as medicine . These are in fact part of Indian food because of their medicinal  value, in curing as well prevention.
Bhartendu Prakash

On 25 Aug 2014 10:29, “S Kulshreshtha” <skulshreshtha@greensync.co.in> wrote:

सभी मित्रों को नमस्कार,

 आज हम आपके साथ उन्नत तरीके से हल्दी की पैदावार की जानकारी साझा कर रहे है। जैसा की आप  जानते है की बुंदेलखंड के काफी क्षेत्र   जैसे टीकमगढ़ ,झाँसी ललितपुर आदि में हल्दी की खेती बहुतायत मात्रा   में  जाती है , यद्दपि किसान हल्दी की फसल उत्पादन  पारम्परिक तरीको से अवगत भी है परन्तु यदि हम इन तरीको में कुछ परिवर्तन करे तो हमें उत्पादन काफी  अच्छा मिल सकता है तथा  लागत भी काम आएगी। हल्दी एक महत्वपूर्ण मसाले वाली फसल है जिसका उपयोग औषधि से लेकर अनेकों कार्यो में किया जाता है। इसके गुणों का जितना भी बखान किया जाए थोड़ा ही है, क्योंकि यह फसल गुणों से परिपूर्ण है इसकी खेती आसानी से की जा सकती है तथा कम लागत तकनीक को अपनाकर इसे आमदनी का एक अच्छा साधन बनाया जा सकता है। यदि किसान भाई इसकी खेती ज्यादा मात्रा में नहीं करना चाहते तो कम से कम इतना अवश्य करें जिसका उनकी प्रति दिन की हल्दी की मांग को पूरा किया जा सकें। निम्नलिखित शास्त्र वैज्ञानिक पद्धतियों को अपना कर हल्दी की खेती सफलता पूर्वक की जा सकती है।

 

 

हल्दी की उन्नत काश्त पद्धति से खेती

भूमि का चुनाव:- 

हल्दी की खेती बलुई दोमट या मटियार दोमट मृदा में सफलतापूर्वक की जाती है। जल निकास की उचित व्यवस्था होना चाहिए। यदि जमीन थोडी अम्लीय है तो उसमें हल्दी की खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है।

भूमि की तैयारी:-

हल्दी की खेती हेतु भूमि की अच्छी तैयारी करने की आवश्यकता है क्योंकि यह जमीन के अंदर होती है जिससे जमीन को अच्छी तरह से भुरभुरी बनाया जाना आवश्यक है। मोल्ड बोल्ड प्लाऊ से कम से कम एक फीट गहरी जुताई करने के बाद दो तीन बार कल्टीवेटर चलाकर जमीन को अच्दी तरह से तैयार कर लेना चाहिए और इसमें पाटा चलाकर जमीन को समतल कर लें एवं बडे ढ़ेलो को छोटा कर लेना चाहिए।

खाद तथा उर्वरक:-

20 से 25 टन /हे. के मान से अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद का उपयोग करना चाहिए क्योंकि गोबर की खाद डालने से जमीन अच्छी तरह से भुरभुरी बन जायेगी तथा जो भी रासायनिक उर्वरक दी जायेगी उसका समुचित उपयोग हो सकेगा। इसके बाद 100-120 कि. नत्रजन 60-80 कि. स्फुर 80-100 तथा कि./हे. के मान से पोटाश का प्रयोग करना चाहिए। हल्दी की खेती हेतु पोटाश का बहुत महत्व है जो किसान इसका प्रयोग नही करते है हल्दी की गुणवत्ता तथा उपज दोनों ही प्रभावित होती है। नत्रजन की एक चैथाई मात्रा तथा स्फुर एवं पोटाश की पूरी मात्रा बोनी के समय दी जानी चाहिए एवं नत्रजन की बची मात्रा की दो भागों में बांटकर पहली मात्रा बुआई के 40 से 60 दिनों बाद तथा दूसरी मात्रा 80 से 100 दिनों बाद देना चाहिए।

फसल चक्र:-

हल्दी की सफल खेती हेतु उचित फसल चक्र का अपनाना अति आवश्यक है। इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि हल्दी की खेती लगातार उसी जमीन पर न की जावें क्योंकि यह फसल जमीन से ज्यादा से ज्यादा पोषक तत्वों को खींचती है जिससे दूसरे साल उसी जमीन में इसकी खेती नहीं करें तो ज्याद अच्छा होगा। सिंचित क्षेत्रों में मक्का, आलू, मिर्च, ज्वार, धान, मूँगफल्ली आदि फसलों के साथ फसल चक्र अपनाकर हल्दी की खेती सफलतापूर्वक  की जा सकती है।

विकसित किस्में :-

मसाले वाली किस्‍म, पूना, सोनिया, गौतम, रशिम, सुरोमा, रोमा, क्रष्णा, गुन्टूर, मेघा, हल्दा1, सुकर्ण, सुगंधन तथा सी.ओ.1 आदि प्रमुख जातियां है जिनका चुनाव किसान कर सकते है। थोडी सी मात्रा यदि एक बार मिल जाती है तो फिर अपना बीज तैयार किया जा सकता है।

बुआई:-

जिन किसान भाइयों के पास पानी की पर्याप्त सुविधा है वे अपरील के दूसरे पखवाडे़ से जुलाई के प्रथम सप्ताह तक हल्दी को लगा सकते है। लेकिन जिनके पास सिंचाई सुविधा का पर्याप्त मात्रा में अभाव है वे मानसून की बारिश शुरू होते ही हल्दी लगा सकते है किंतु खेती की तेयारी पहले से ही करके रखना चाहिए। जमीन अच्छी तरह से तैयार करने के बाद 5-7 मी., लम्बी तथा 2-3 मी. चौड़ी क्यांरिया बनाकर 30 से 45 से. मी. कतार से कातर तथा 20 – 25 से.मी. पौध से पौध की दूरी रखते हुए 4-5 से.मी. गहराइ पर गाठी कन्दो को लगाना चाहिए। इस तरह से हल्दी लगाने से 12 – 15 किवंटल हे. गाठों की जरूरत पड़ती है।

सिंचाई :-

हल्दी में ज्यादा सिंचाई की आवश्यकता नहीं है लेकिन यदि फसल गर्मी में ही बुवाई जाती है तो वर्षा प्रारंभ होने के पहले तक 4-5 सिंचाई की आवश्यकता पड़ती हैं। मानसून आने के बाद सिंचाई की जरूरत नहीं पड़ती है। किंतु यदि बीच में वर्षा नहीं होती या कि सुखा पड़ जाता है तथा अक्टूबर के बाद यदि बारिश नहीं हो पाती है तो ऐसी परिसिथति में 20-25 दिन के अंतराल पर सिंचाई करना आवश्यक हो जाता है। नवम्बर माह में पतितयों का विकास तथा धनकन्द की मोटाई बढ़ना आरंभ हो जाता है तो उस समय उपज ज्यादा प्राप्त करने हेतु मिटटी चढ़ाना आवश्यक हो जाता है जिससे कन्दो का विकास अच्छा होता है तथा उत्पादन में वृद्धि हो जाती है।

जल निकास :-

जल निकास का उचित प्रबंध करना चाहिए अन्यथा हल्दी की फसल पर विपरीत प्रभाव पड़ता है तथा पौधे एवं पत्तियां पीली पड़ने लगती है। अत: समय-समय पर वर्षा के ज्यादा पानी को खेत से बाहर निकालने की उचित व्यवस्था होनी चाहिए।

खरपतवार नियंत्रण :-

हल्दी की अच्छी फसल होने हेतु 2-3 निराइ करना आवश्यक हो जाता है। पहली निरार्इ बुआर्इ के 80-90 दिनों बाद तथा दूसरी निराइ इसके एक माह बाद करना चाहिए किन्तु यदि खरपतवार पहले ही आ जाते है तथा ऐसा लगता है कि फसल प्रभावित हो रही है तो इसके पहले भी एक निराइ की जा सकती है। इसके साथ ही साथ समय-समय पर गुड़ाइ भी करते रहना चाहिए जिससे वायु संचार अच्छा हो सके तथा हल्दी की फसल का पूर्ण विकास हो सके जो कि उत्पादन से सीधा संबंध रखता है।

कीट नियंत्रण :-

आम तौर पर हल्दी में कीड़ो की कोरइ ज्यादा समस्या नहीं देखी गई है कहीं- कहीं पर बेधक तथा थि्रप्स (रस चुसने वाले कीटों की) की समस्या आती है। तना बेधक हेतु फोरेट थीमेट दो में से कोई एक दवा का 10 कि. हे के हिसाब से प्रयोग किया जा सकता है।

कटाई :-

मई- जून में  बोई गई फसल फरवरी माह तक खोदने लायक हो जाती है इस समय धन कन्दो का विकास हो जाता है और पत्तियां पीली पड़कर सूखने लगती है तभी समझना चाहिए कि हल्दी पक चुकी है तथा अब इसकी कटाइ या खोदाइ की जा सकती है। पहले पौधो के दराती हसिए से काट देना चाहिए तथा बाद में हल से जुताई करके हल्दी के कन्दो को आसानी से निकाला जा सकता है जहां पर भी जरूरत समझी जाए कुदाली का भी प्रयोग किया जा सकता है। हल्दी की अगेती फसल 7-8 माह मध्यम 8-9 माह तथा देर से पकने  वाली 9-10 माह में पककर तैयार हो जाती है।

उपज :-

जहां पर उपरोक्त मात्रा में उर्वरक तथा गोबर की खाद का प्रयोग किया गया है तथा सिचिंत क्षेत्र में फसल बोई गई है तो 50-100 किवंटल प्रति हें. तथा असिचित क्षेत्रों से 50-100 किवंटल प्रति हे. कच्ची हल्दी प्राप्त की जा सकती है। यह ध्यान रहे कि कच्ची हल्दी को सूखाने के बाद 15-25 प्रतिशत ही रह जाती है।

उपचार (रचाइ) :-

हल्दी को खोदते समय पूरी तौर से सावधानी बरतनी चाहिए जिससे धन कन्दो की कम हानि हो और समूची गाठें निकाली जा सकें गाठों को पहले छोटा-छोटा कर लिया जाता है इसके बाद बड़े-बड़े कड़ाहों में डालकर इसको उबाला जाता है। उबालते समय थोड़ा गोबर या फिर हल्दी की पत्तियों को ही पानी के साथ डालकर उबाला जाता है। ऐसा करने से रंग कुछ गहरा हो जाता है तथा हल्दी की गुणवता बढ़ जाती है जिससे बाजार में भाव अच्छा मिलता है। लगभग 3-4 घंटे पकाने के बाद गाठें अंगुलियों की बीच दबाने पर आसानी से दब जाती है तो कड़ाहों से निकाल कर सूखने हेतु धूप में रखा जाता है जिससे गाठें अच्छी तरह से सूख जावें। इसके बाद किसी खुरदूरे चीज से गाठों को रगड़ कर साफ कर लिया जाता है बड़े पैमाने पर यह कार्य मशीनों पर किया जाता है और इस तरह से हल्दी की गाठें तैयार हो जाती है।

  


आपको यह संदश इसलिए मिला है क्योंकि आपने Google समूह के “Bharat Knowledge & Information Network” समूह की सदस्यता ली है.
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By   August 25, 2014

सभी मित्रों को नमस्कार,

 आज हम आपके साथ उन्नत तरीके से हल्दी की पैदावार की जानकारी साझा कर रहे है। जैसा की आप  जानते है की बुंदेलखंड के काफी क्षेत्र   जैसे टीकमगढ़ ,झाँसी ललितपुर आदि में हल्दी की खेती बहुतायत मात्रा   में  जाती है , यद्दपि किसान हल्दी की फसल उत्पादन  पारम्परिक तरीको से अवगत भी है परन्तु यदि हम इन तरीको में कुछ परिवर्तन करे तो हमें उत्पादन काफी  अच्छा मिल सकता है तथा  लागत भी काम आएगी। हल्दी एक महत्वपूर्ण मसाले वाली फसल है जिसका उपयोग औषधि से लेकर अनेकों कार्यो में किया जाता है। इसके गुणों का जितना भी बखान किया जाए थोड़ा ही है, क्योंकि यह फसल गुणों से परिपूर्ण है इसकी खेती आसानी से की जा सकती है तथा कम लागत तकनीक को अपनाकर इसे आमदनी का एक अच्छा साधन बनाया जा सकता है। यदि किसान भाई इसकी खेती ज्यादा मात्रा में नहीं करना चाहते तो कम से कम इतना अवश्य करें जिसका उनकी प्रति दिन की हल्दी की मांग को पूरा किया जा सकें। निम्नलिखित शास्त्र वैज्ञानिक पद्धतियों को अपना कर हल्दी की खेती सफलता पूर्वक की जा सकती है।

 

 

हल्दी की उन्नत काश्त पद्धति से खेती

भूमि का चुनाव:- 

हल्दी की खेती बलुई दोमट या मटियार दोमट मृदा में सफलतापूर्वक की जाती है। जल निकास की उचित व्यवस्था होना चाहिए। यदि जमीन थोडी अम्लीय है तो उसमें हल्दी की खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है।

भूमि की तैयारी:-

हल्दी की खेती हेतु भूमि की अच्छी तैयारी करने की आवश्यकता है क्योंकि यह जमीन के अंदर होती है जिससे जमीन को अच्छी तरह से भुरभुरी बनाया जाना आवश्यक है। मोल्ड बोल्ड प्लाऊ से कम से कम एक फीट गहरी जुताई करने के बाद दो तीन बार कल्टीवेटर चलाकर जमीन को अच्दी तरह से तैयार कर लेना चाहिए और इसमें पाटा चलाकर जमीन को समतल कर लें एवं बडे ढ़ेलो को छोटा कर लेना चाहिए।

खाद तथा उर्वरक:-

20 से 25 टन /हे. के मान से अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद का उपयोग करना चाहिए क्योंकि गोबर की खाद डालने से जमीन अच्छी तरह से भुरभुरी बन जायेगी तथा जो भी रासायनिक उर्वरक दी जायेगी उसका समुचित उपयोग हो सकेगा। इसके बाद 100-120 कि. नत्रजन 60-80 कि. स्फुर 80-100 तथा कि./हे. के मान से पोटाश का प्रयोग करना चाहिए। हल्दी की खेती हेतु पोटाश का बहुत महत्व है जो किसान इसका प्रयोग नही करते है हल्दी की गुणवत्ता तथा उपज दोनों ही प्रभावित होती है। नत्रजन की एक चैथाई मात्रा तथा स्फुर एवं पोटाश की पूरी मात्रा बोनी के समय दी जानी चाहिए एवं नत्रजन की बची मात्रा की दो भागों में बांटकर पहली मात्रा बुआई के 40 से 60 दिनों बाद तथा दूसरी मात्रा 80 से 100 दिनों बाद देना चाहिए।

फसल चक्र:-

हल्दी की सफल खेती हेतु उचित फसल चक्र का अपनाना अति आवश्यक है। इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि हल्दी की खेती लगातार उसी जमीन पर न की जावें क्योंकि यह फसल जमीन से ज्यादा से ज्यादा पोषक तत्वों को खींचती है जिससे दूसरे साल उसी जमीन में इसकी खेती नहीं करें तो ज्याद अच्छा होगा। सिंचित क्षेत्रों में मक्का, आलू, मिर्च, ज्वार, धान, मूँगफल्ली आदि फसलों के साथ फसल चक्र अपनाकर हल्दी की खेती सफलतापूर्वक  की जा सकती है।

विकसित किस्में :-

मसाले वाली किस्‍म, पूना, सोनिया, गौतम, रशिम, सुरोमा, रोमा, क्रष्णा, गुन्टूर, मेघा, हल्दा1, सुकर्ण, सुगंधन तथा सी.ओ.1 आदि प्रमुख जातियां है जिनका चुनाव किसान कर सकते है। थोडी सी मात्रा यदि एक बार मिल जाती है तो फिर अपना बीज तैयार किया जा सकता है।

बुआई:-

जिन किसान भाइयों के पास पानी की पर्याप्त सुविधा है वे अपरील के दूसरे पखवाडे़ से जुलाई के प्रथम सप्ताह तक हल्दी को लगा सकते है। लेकिन जिनके पास सिंचाई सुविधा का पर्याप्त मात्रा में अभाव है वे मानसून की बारिश शुरू होते ही हल्दी लगा सकते है किंतु खेती की तेयारी पहले से ही करके रखना चाहिए। जमीन अच्छी तरह से तैयार करने के बाद 5-7 मी., लम्बी तथा 2-3 मी. चौड़ी क्यांरिया बनाकर 30 से 45 से. मी. कतार से कातर तथा 20 – 25 से.मी. पौध से पौध की दूरी रखते हुए 4-5 से.मी. गहराइ पर गाठी कन्दो को लगाना चाहिए। इस तरह से हल्दी लगाने से 12 – 15 किवंटल हे. गाठों की जरूरत पड़ती है।

सिंचाई :-

हल्दी में ज्यादा सिंचाई की आवश्यकता नहीं है लेकिन यदि फसल गर्मी में ही बुवाई जाती है तो वर्षा प्रारंभ होने के पहले तक 4-5 सिंचाई की आवश्यकता पड़ती हैं। मानसून आने के बाद सिंचाई की जरूरत नहीं पड़ती है। किंतु यदि बीच में वर्षा नहीं होती या कि सुखा पड़ जाता है तथा अक्टूबर के बाद यदि बारिश नहीं हो पाती है तो ऐसी परिसिथति में 20-25 दिन के अंतराल पर सिंचाई करना आवश्यक हो जाता है। नवम्बर माह में पतितयों का विकास तथा धनकन्द की मोटाई बढ़ना आरंभ हो जाता है तो उस समय उपज ज्यादा प्राप्त करने हेतु मिटटी चढ़ाना आवश्यक हो जाता है जिससे कन्दो का विकास अच्छा होता है तथा उत्पादन में वृद्धि हो जाती है।

जल निकास :-

जल निकास का उचित प्रबंध करना चाहिए अन्यथा हल्दी की फसल पर विपरीत प्रभाव पड़ता है तथा पौधे एवं पत्तियां पीली पड़ने लगती है। अत: समय-समय पर वर्षा के ज्यादा पानी को खेत से बाहर निकालने की उचित व्यवस्था होनी चाहिए।

खरपतवार नियंत्रण :-

हल्दी की अच्छी फसल होने हेतु 2-3 निराइ करना आवश्यक हो जाता है। पहली निरार्इ बुआर्इ के 80-90 दिनों बाद तथा दूसरी निराइ इसके एक माह बाद करना चाहिए किन्तु यदि खरपतवार पहले ही आ जाते है तथा ऐसा लगता है कि फसल प्रभावित हो रही है तो इसके पहले भी एक निराइ की जा सकती है। इसके साथ ही साथ समय-समय पर गुड़ाइ भी करते रहना चाहिए जिससे वायु संचार अच्छा हो सके तथा हल्दी की फसल का पूर्ण विकास हो सके जो कि उत्पादन से सीधा संबंध रखता है।

कीट नियंत्रण :-

आम तौर पर हल्दी में कीड़ो की कोरइ ज्यादा समस्या नहीं देखी गई है कहीं- कहीं पर बेधक तथा थि्रप्स (रस चुसने वाले कीटों की) की समस्या आती है। तना बेधक हेतु फोरेट थीमेट दो में से कोई एक दवा का 10 कि. हे के हिसाब से प्रयोग किया जा सकता है।

कटाई :-

मई- जून में  बोई गई फसल फरवरी माह तक खोदने लायक हो जाती है इस समय धन कन्दो का विकास हो जाता है और पत्तियां पीली पड़कर सूखने लगती है तभी समझना चाहिए कि हल्दी पक चुकी है तथा अब इसकी कटाइ या खोदाइ की जा सकती है। पहले पौधो के दराती हसिए से काट देना चाहिए तथा बाद में हल से जुताई करके हल्दी के कन्दो को आसानी से निकाला जा सकता है जहां पर भी जरूरत समझी जाए कुदाली का भी प्रयोग किया जा सकता है। हल्दी की अगेती फसल 7-8 माह मध्यम 8-9 माह तथा देर से पकने  वाली 9-10 माह में पककर तैयार हो जाती है।

उपज :-

जहां पर उपरोक्त मात्रा में उर्वरक तथा गोबर की खाद का प्रयोग किया गया है तथा सिचिंत क्षेत्र में फसल बोई गई है तो 50-100 किवंटल प्रति हें. तथा असिचित क्षेत्रों से 50-100 किवंटल प्रति हे. कच्ची हल्दी प्राप्त की जा सकती है। यह ध्यान रहे कि कच्ची हल्दी को सूखाने के बाद 15-25 प्रतिशत ही रह जाती है।

उपचार (रचाइ) :-

हल्दी को खोदते समय पूरी तौर से सावधानी बरतनी चाहिए जिससे धन कन्दो की कम हानि हो और समूची गाठें निकाली जा सकें गाठों को पहले छोटा-छोटा कर लिया जाता है इसके बाद बड़े-बड़े कड़ाहों में डालकर इसको उबाला जाता है। उबालते समय थोड़ा गोबर या फिर हल्दी की पत्तियों को ही पानी के साथ डालकर उबाला जाता है। ऐसा करने से रंग कुछ गहरा हो जाता है तथा हल्दी की गुणवता बढ़ जाती है जिससे बाजार में भाव अच्छा मिलता है। लगभग 3-4 घंटे पकाने के बाद गाठें अंगुलियों की बीच दबाने पर आसानी से दब जाती है तो कड़ाहों से निकाल कर सूखने हेतु धूप में रखा जाता है जिससे गाठें अच्छी तरह से सूख जावें। इसके बाद किसी खुरदूरे चीज से गाठों को रगड़ कर साफ कर लिया जाता है बड़े पैमाने पर यह कार्य मशीनों पर किया जाता है और इस तरह से हल्दी की गाठें तैयार हो जाती है।

  


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[B-KIN] Fwd: जैविक खेती – विषमुक्त कृषि के तीन सरल सूत्र

By   August 25, 2014
सभी साथियों को नमस्कार,
हमारे एक मित्र ने रोचक और उपयोगी जानकारी भेजी है. आप सभी को प्रेषित है, इस आशा के साथ के अधिकधि लोग इससे लाभ उठा पायें। 
भवदीय,
सोनल कुलश्रेष्ठ 

विषमुक्त कृषि के तीन सरल सूत्र

स्वदेशी, स्वावलंबी एवं विषमुक्त कृषि के तीन सरल सूत्र

(१) गोबर एवं गोमूत्र से बनाया गया अद्भुत खाद 1 एकड़ जमीन के लिए
बनाने की विधि——–
१. 15 किलो गोबर, 15 लीटर गोमूत्र, 1 किलो गुड(सडा हुआ), 1 किलो दाल का आटा( मुग मुसुर राहेड चना किसी भी दाल का चुरा), पुराने पेड़ की मिटटी १ किलो क्रम से एक साथ किसी बड़े जगह में मिलायें……

२. 15 दिन तक प्रतिदिन सुबह शाम डंडे से बने घोल को हिलायें….
३. 16 वे दिन से प्राप्त घोल का प्रयोग खाद के रूप में किया जा सकता है….
४. खेतों में इसका प्रयोग 21 दिन में एक बार पूरा करना आवश्यक है….

यह अत्यंत शक्तिशाली उपयोगी खाद है जिसके प्रयोग से खेतों में उत्पादन अच्छा होता है और खेत की मिटटी हमेसा अच्छी और उपजाऊ बनी रहती है भूमि को सभी आवश्यक तत्त्व गोबर गोमूत्र से बने खाद से स्वयं ही प्राप्त हो जाता है………कीट एवं हानिकारक जंतु उत्पन्न नहीं होते, रासायनिक खादों के प्रयोग से कीट एवं जंतु अधिकांश मात्र में उत्पन्न होते हैं जो फसलों को नस्ट करते हैं………

(२) जैविक कीटनाशक का निर्माण
बनाने की विधि———
२० लीटर गोमूत्र , 3किलो नीम का पत्ता या निम्बोली, ३किलो धतुरा का पत्ता, ३किलो आकन्त का पत्ता, ३किलो बेल्पत्ता, ३ किलो सरीफा का पत्ता(सीताफल), ३ किलो आडू का पत्ता

१. २० लीटर गोमूत्र में सभी पत्तियों की चटनी बनाकर डाल दें
२. मूत्र को उबालना है, उबलते समय 500 -750gm तम्बाकू का पाउडर डाल दें
३. थोड़ी देर उबलने के बाद प्राप्त घोल को ठंडा कर लें…….और पात्रों में भर कर रख लें

प्राप्त घोल अत्यंत प्रभावकारी कीटनाशक है यह खेत में उत्पन्न होने वाले सभी हानिकारक कीटों एवं जन्तुओं को मारने में सक्षम है
प्रयोग—-खेतों में प्रयोग से पूर्व 1 लीटर कीटनाशक में 20 लीटर जल मिला लें उसके बाद ही प्रयोग करें

२-३ दिनों में ही १००% सभी हानिकारक कीट एवं जन्तुओं की मृत्यु हो जाती हैं फसल पर दुबारा कीट लगने की संभावनायें समाप्त हो जाती है……..
(३) बीज संस्कार 1kg बीज के लिए
१. 1kg गोबर एवं गोमूत्र मिलायें
२. १०० ग्राम कलई चुना २-३ लीटर पानी में तैयार करें (शाम को पानी में डाल देने पर सुबह तक चुना तैयार हो जाता है)

३.प्राप्त चुना जल को गोबर एवं गोमूत्र में मिलायें
1kg गोबर+ 1kg गोमूत्र+ प्राप्त चुना जल
४. बीजों को अब इस घोल में डाल दें 6 -7 घंटे बाद निकालकर छांव में सुखा दीजिये
प्रयोग के बाद जो बीज हमें प्राप्त हुए हैं इनका प्रयोग करने से प्रमुख लाभ १. फसल उत्पादन अच्छा और अधिक होता है

२. कीट लगने की संभावनायें कम रहती हैं
३. भूमि उपजाऊ बनी रहती है

प्रयोगों के लिए आवश्यक दिशा निर्देश——–१. गाय बैल या भेंस के मल एवं मुत्रों का उपयोग तीनो विधियों में किया जा सकता है किन्तु गाय के मल एवं मुत्रों का प्रयोग सर्वोत्तम होता है………

२.प्रत्येक विधि 1 एकड़ जमीन और 1kg बीज के लिए बताई गयी है आवश्यकता अनुसार सामग्रियां दुगनी कर लीजिये

विषमुक्त जैविक एवं स्वदेशी कृषि के लाभ
१. प्रकृति एवं पर्यावरण से संतुलन बनाकर अच्छा और अधिक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है

२. उत्पन्न खाद्यान्न में उचित मात्र में सभी पोषकतत्व उपलब्ध होते हैं स्वस्थ भोजन प्राप्त होता है
३.विषयुक्त भोजन एवं उनसे होने वाले असाध्य बीमारियों एवं रोगों से मुक्ति मिलती है
४. शरीर की प्रतिरोधी क्षमता का विकास होता है हम स्वस्थ और रोगों से मुक्त रहते हैं

५. कम खर्चे में अधिक लाभ कमाया जा सकता है स्वदेशी कृषि ही एक ऐसा स्वावलंबी कार्य है जिसमे 900% लाभ कमाया जा सकता है यदि हम 10 रूपये खर्च करते हैं तो 100 रूपये कमा सकते हैं
६. हमारे पशुधन का संवर्धन होता है
७.रासायनिक खाद एवं कीटनाशकों में होने वाला खर्चा बच सकता है

८. स्वस्थ सुखी समृद्ध एवं स्वावलंबी भारत का निर्माण संभव है.!

 


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